Monday, August 10, 2009

नाचे सारा जहां

नृत्य का इतिहास उतना ही पुराना है जितना की मानव की उत्पत्ति का, जब मानव ने हवाओं की गति के साथ हिलना तथा पानी के साथ चलना सीख लिया था । अपने आनन्द और खुशी को प्रकट करने के लिए मानव उछलता था और कूद फाँद कर अपने उल्लास को प्रकट करता था । आज भी हम अपने को आनन्दित करने के लिए नृत्य का प्रयोग करते हैं और दूसरों द्वारा किये गये नृत्यों को देखकर आनन्दमय हो झूमने लगते हैं । नारद संहिता में नृत्य को किस समय करना चाहिए अर्थात् नृत्य किस मुर्हत में हो, इसका भी विवरण है ।
उत्तरात्रयमित्रेंद्रवसुवारूणभेषु च ।
पुष्पार्कपौष्णधिष्ण्येषू नृत्यारभः प्रशस्यते ।।

तीनों उतरा, अनुराधा, ज्येष्ठा , धमिष्ठा, शतभिषा, पुष्य, हस्त और रेवती - इन नक्षत्रों में नृत्य प्रारम्भ करना शुभ है । पौराणिक कथाओं में तो हमें नृत्य के होने का पता चलता ही है ,महाभारत, रामायण, वेद में भी इन नृत्यों के होने का उल्लेख मिलता है । लाखों वर्ष पूर्व भरत मुनि द्वारा नाट्य शास्त्र की रचना यह दर्शाती है कि हमारी प्रचलित नृत्य शैलियाँ लाखों वर्ष पूर्व जन्मी थीं । नाट्य शास्त्र एक ऐसा ग्रन्थ है जिसमें दृश्य, श्रव्य, उभयविद्य काव्य का सर्वांगीण विवेचन हुआ है । आधुनिक काल में इनका संबंध मंदिरों तथा राज्य दरबारों में अधिक हुआ । मंदिरों में भगवान की पूजा अर्चना तथा के प्रचार प्रसार का साधन बनी इनके द्वारा धार्मिक कथाओं प्रवचनों उपदेशों को अधिक रोचक रुप में प्रस्तुत किया जाता था । जिससे लोग धर्म में रुचि रख बड़े प्रेम से धर्म का लाभ प्राप्त करते थे परन्तु राजदरबारों में नृत्य विलासिता का प्रतीक बना ।
इतिहास में कई ऐसे राजे और रजवाड़ों का उल्लेख मिलता है जहाँ नृत्यांगनाओं द्वारा उस राज्य का विकास रुक गया । परन्तु कला प्रेमी राजाओं ने नृत्य कला को प्रोत्साहन भी दिया । जिससे उनके दरबार में नृत्यकारों को उनकी कला में समर्पण के लिए पुरस्कृत किया जाता था ।
नृत्य कला के क्षेत्र में पहले लोक नृत्य का जन्म हुआ अथवा शास्त्रीयता , यह कहना विवादपस्त है परन्तु यह बात हमारे विवेक में असानी से घर बना सकती है कि पहले मनुष्य ने अपने आनंद विभोर के साधन बनाएं होंगे । बाद मे उन्हें संजोने के लिए शास्त्र बनाए होंगे । इसलिए यह साबित होता है कि लोक नृत्य एक ऐसी अनुठी कला है जिसका जन्म निर्माण और उत्पत्ति पूर्ण रुप से प्राकृतिक है । मनुष्य के लक्ष्य में अनेक भाव उमड़ते हैं और अवसर पाकर वह किसी माध्यम के द्वारा प्रकट हो जाते हैं क्योंकि शब्दों के बिना अपने भावों को उमंगों द्वारा प्रकट करना ही नृत्य का रुप है । जैसे - 2 मानव जीवन का विकास होने लगा वैसे ही नृत्य तथा उसकी सहायक कलाओं का भी विकास हुआ नृत्य कला को उभारने में संगीत की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही । काव्य और शिल्प ने नृत्य कला में चार चाँद लगाने जैसा कार्य किया और इन सभी कलाओं के एक साथ प्रयोग ने पूर्ण नृत्य कला का दर्जा हासिल किया । एक पूर्ण लोक नृत्य कला किसी विशेष समुदाय भाषा वेशभूषा, जाति अथवा देश का प्रतीक माना जाता है । जिसके प्रदर्शन से यह सब रुप एक साथ प्रदर्शित होते हैं । रस भाव और व्यंजन से युक्त नर्तन को ही नृत्य कला कहा जाता अगर उस नृत्य में भाव भी हो तो वह अति उत्तम कहलाता है और अगर नृत्य में अभिनय में भाव रस व अनुभूति की कमी हो तो वह नृत्य नृत कहलाता है । ऐसा नृत्य शास्त्रों में कहा गया है । यदि कोई व्यक्ति प्रभु अथवा अपनी आध्यात्मिक शक्ति से कुछ माँगता है तो उसके शब्दों में अगर करुणा, मुद्रा तथा पीड़ा होगी तब वह दाता को भी अपनी तरफ रीझा सकता है । अर्थात मानव अपनी आन्तरिक पीड़ा को करुणा रस और भावों में सबल रुप से डुबो कर अपने आध्य को प्रस्तुत करेगा तो दाता का हृदय भी उसके प्रति दया से अभिभूत हो जाएगा । इस प्रकार यदि नृत्य अभिनय हस्तकों मुद्राओं और अलग अलग गतियों (तालों) में एकाग्रचित होकर किया जाता है । तब वह अधिक महत्व रखता है संगीत के यदि वाद्ययंत्रों की संगत के आश्रय में आकर इसका रुप निखर जाता है और वास्तविक रसीटे़क के कारण समय और स्थान को भूलकर दर्शक एक अनिवर्चनीय आनंद की सत्ता में लीन हो जाता है जिसे असीम आनंद की अवस्था कहते हैं और यह सुख अथवा निरस्ता संसार से मनुष्य को कुछ समय के लिए अलग करती है और उस समय नृत्य आयोजन का प्रयास सफल कहलाता है ।
नृत्य कला अपने आप में एक पूर्ण एंव स्वतंत्र कला है, जिसका विकसित रुप आज देश व विश्व की सभी नृत्य शैलियों में स्पष्ट दिखाई देता है । आदिकाल से जो नृत्य अपने देव (भगवान) को प्रसन्न करने के लिए किया जाता था । आज उस भगवान का रुप बदल कर दर्शक हो गया है । वही दर्शक आज नृर्तक का सब कुछ है । अगर दर्शकों को वह नृत्य भा जाता है तो उस नृर्तक की पूजा सफल कहलाती है और उसका मार्ग प्रश्सत होता है । शास्त्रों के अनुसार नृत्य कला प्राचीन काल में ही पूर्ण विकसित हो चुकी थी । तभी इस पर ग्रंथों और शास्त्रों की रचना की गई थी । अगर ऐसा न होता तो उन पर साहित्य लिखना संभव ही नहीं था और तभी उसे नाट्य शास्त्र में सम्मिलित किया गया ।
आज नृत्य मानव जीवन में काफी महत्व रखता है । नृत्य एक कला के साथ आज के युग में आजीविका का साधन है । नृत्य ने एक कला के साथ-साथ विज्ञान का रुप धारण कर लिया है । विज्ञान की भाँति नृत्य पर भी अनेक शोध किए जा रहे हैं । नृत्य को वास्तव में मानव, शरीर का क्रिया विज्ञान माना गया है । मानव अपने शरीर की विभिन्न क्रियाएं कर अपने हाथ पाँव व शरीर में नित नए प्रयोग कर नवीन रसों की उत्पत्ति कर रहा है । बड़े - 2 गुरु, बड़े गुरुकुलों की अपेक्षा नृत्य प्रयोगशालाओं में यह प्रयोग कर रहे हैं । आजीविका की होड़ ने प्रतिस्पर्धा का रुप ले लिया है । नृत्य सिखाने के लिए विश्वविद्यालय स्थापित किए जा रहे हैं । उनमें नृत्य के व्यवसायिक गुणों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है । नृत्य शैलियों को जन्म दिया जा रहा है । जिसके फलस्वरुप उसकी प्राचीनता, पवित्रता सब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है । बड़े - बड़े व्यापारिक संस्थान इस व्यवसाय में आगे आने लगे हैं । सिनेमा इसका एक उदाहरण है । सिनेमा में नृत्य का जो व्यवसायिक रुप है वह समाज को अधिक आकर्षित कर रहा है । लोग धन की खातिर ऐसे व्यवसाय की तरफ अधिक आकर्षित हो रहे हैं । जबकि सत्य यह है कि सिनेमा में अपनाए गए नृत्य के माप दण्ड काल्पनिक हैं उनका शास्त्र व नृत्य की प्राचीनता, पवित्रता से कोई सरोकार नहीं है । जबकि सत्य है कि जो अधिक स्वादिष्ट होता है वही परोसा जाता है । इससे यह स्पष्ट होता है कि आज मनुष्य शुद्धता का रसिक न होकर अश्लीलता का पुजारी होकर रह गया है ।
सरकार की तरफ से नृत्य की शुद्धता को बचाने के अनेक प्रयास जारी हैं । शास्त्रीय शैली के संरक्षण हेतु अनेक योजनाएँ बनाई जा रही हैं । शास्त्रीय धरोहर को बचाने का कार्य करने वाली संस्थाओं को अनुदान दिया जा रहा है । नृत्याचार्य को देश के सर्वोच्च सम्मानों से सम्मानित किया जा रहा है । परन्तु नृत्य में व्यवसायिकता की भूख नृत्य को निगलने में पूर्ण सक्षम है । समय और परिस्थितियाँ भी नृत्य कला को संरक्षण देने और बदलाव लाने के लिए उत्तरदायी है ।
धार्मिकता
हिन्दू धर्म: अगर हम यह कहें कि शास्त्रीय नृत्य का निर्माण हिन्दू धर्म की देन है, अर्थात् शास्त्रीय नृत्यों को हिन्दू देवताओं ने ही जन्म दिया है । जिसका प्रमाण नाट्य शास्त्र है । नाट्य शास्त्र एक शुद्ध हिन्दू शास्त्र है जिसमें यह स्पष्ट रुप से बताया गया है कि किन परिस्थितियों में भगवान शिव ने तांडव किया और भगवान ब्रह्मा के कहने पर भरतमुनि ने नाट्य शास्त्र की रचना की । इसके पश्चात् देवताओं के मनोरंजन हेतू नृत्य का प्रयोग इन्द्र सभा में होने लगा । रम्भा, मेनका और उर्वशी जैसी नृत्यांगनाओं का रुप प्रकट हुआ । इसके पश्चात् देवी-देवताओं की अराधना में नृत्य का प्रयोग शुरु हुआ । नृत्य के माध्यम से देवों की अर्चना होने लगी । साथ - साथ नृत्यों के ज्ञाताओं को मंदिरों में उच्च श्रेणी का स्थान प्राप्त हुआ । ईश्वरीय कथाओं का प्रचार-प्रसार का माध्यम नृत्य बना । पौराणिक विषयों को माध्यम बनाकर नृत्य के द्वारा शिक्षा दी जाने लगी क्योंकि नृत्य की संरचना मानव से पहले ही कर ली गई थी इसलिए यह भी कह सकते हैं कि नृत्य ही वह प्रथम विषय है जिसके द्वारा शिक्षा का पाठ्यक्रम बना और गुरु-शिष्य परंपरा बनी । इसी परंपरा के अन्तर्गत मन्दिरों में यह शिक्षा दी जाने लगी । भगवान शिव का नटराज रुप नृत्य के लिए प्ररेणा हुआ । देवदासी प्रथा इसका एक स्पष्ट उदाहरण है । मन्दिरों में भगवान की अर्चना हेतू कँवारी कन्याओं को रखा जाने लगा । भगवान शिव की अर्चना के लिए सभी मन्दिरों में देवदासी प्रथा की शुरुआत हुई । सभी हिन्दू त्योहारों व उत्सवों में नृत्य का महत्व अधिक व विशेष स्थान है इसलिए यह कहना गलत नहीं कि भारतीय संस्कृति की महान धरोहर को संजोह कर रखने में हिन्दू धर्म व मंदिरों का विशेष योगदान है । आज अगर हम शास्त्रीय नृत्यों को हिन्दू नृत्यों का नाम दें तो भी वह गलत नहीं है क्योंकि शास्त्रीयता ही इसका स्वयं एक प्रमाण है । आज जब भी राष्ट्रीय एकता के प्रर्दशन की बात आती है तो शास्त्रीय नृत्य अथवा अन्य शास्त्रीय कलाओं को याद किया जाता है क्योंकि कला को धर्म निरपेक्ष माना जाता है । सभी धर्मों के लोग नृत्यकला को सीखते हैं और उसका प्रर्दशन करते हैं । हमारा देश धर्म निरपेक्ष गणराज्य है यहाँ सभी धर्मों को आदर के साथ देखा जाता है । शास्त्रीय नृत्य कला का धर्म बेशक हिन्दू है परन्तु एक सा समय नहीं रहता । उताव-चढ़ाव प्राकृतिक हैं । ऐसा ही समय नृत्य कला में भी रहा है । जब मुगल भारत में आए तो उन्होंने हिन्दूओं की सांस्कृतिक धर्मों को काफी नुकसान पहुँचाया यहाँ तक कि धार्मिक स्थल और ग्रंथों को भी जला डाला । यहाँ तक कि नृत्य ग्रंथ नाट्यशास्त्र का भी इस युग मंे कहीं पता नहीं था । नृत्य गुरु या तो भूमिगत हो गये या वो जगलों अथवा आातवास करने लगे । इस्लाम में नाच हराम माना गया है इसलिए यह काल भारतीय नृत्य कला क्षेत्र में बदलाव का युग कहलाया । जिस प्रकार फ्राँस और रूस को क्रांति के समय भी लोगों ने जार को खत्म कर दिया परन्तु उसकी कला वैले को जिंदा रख कर उसे और बढ़ाया । इस प्रकार भारतीय नृत्य कलाओं ने मुगलों के दरबारों में शरण ली और दरबारी नृत्य कला को जन्म दिया गया । नृत्य के इस युग को बिलासिता का युग भी कहा गया । छोटे-छोटे राजा, सामंत, जमींदार भी इस काल में इस कला को रौंदतें रहे । बड़े-बड़े नृत्यकारों को वैश्याओं का संगतकार बनना पड़ा । परन्तु जिस प्रकार खुश्बू छुपाये नहीं छुपती उसी प्रकार नृत्य कला भी इसके रुप में पनपती रही । उसमें मुगलों के दरबारों को अपनाकर उनका सम्मान प्राप्त किया । वाज़िद अली शाह, अकबर, बहादुर शाह ज़फर जैसे राजाओं ने इस काल में कथक नृत्य शैली का सम्मान किया । 200 वर्षों के अंग्रेजी शासन के दौरान भी नृत्य कलाओं को सम्मान नहीं मिला । परन्तु अंग्रेजों ने भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के साहित्य को पुनः जागृत कर भारतीय नृत्यकला को एक नई जान दी । अंग्रेजों के शासन के दौरान नृत्य कलाओं का विकास नहीं हुआ । वह केवल विलासिता के लिए ही नृत्यों का प्रयोग करते थे । केवल 20वीं शताब्दी क आरम्भ में ही श्री उदय शंकर ने भारतीय संस्कृति की पहचान कर उसे आगे बढ़ाया तथा विश्व में उसका सम्मान हुआ ।
नृत्य ही कला है: नाट्यशास्त्र में सर्वप्रथम कला शब्द का प्रयोग नृत्य के लिए ही किया गया है । इस बात के स्पष्ट प्रमाण है । ललित कलाओं के होने का लक्षण नहीं मिलता ।
विशेषमेन कला: सवोयस्मात, तस्मात तु कैशिकः
कला शब्द लोक जीवन में इतना प्रचलित था कि कला शब्द का लक्षण करने की आवश्यकता नहीं थी और यह शब्द लोक व्यवहार में भी प्रचलित था । कला के बिना मानव जीवन अधूरा है । मानव की भावनाओं का विकास कला द्वारा ही संभव है । अगर हमने आनन्द की अनुभूति की है तो हम उस आनन्द को कला के रुप में दूसरो को भी बाँट सकते हैं । वृतहरि कहते हैं:-
‘‘ साहित्य नृत्य कला विहिनः साक्षात पशु पुच्छविषाणहीनः’’
इस श्लोक द्वारा नृत्य कला की प्रशंसा होती है । परन्तु इस श्लोक द्वारा यह भी बात स्पष्ट होती है कि नृत्य और साहित्य अलग-अलग है अर्थात् कला शब्द प्राचीन समय से ही प्रयोग होता रहा है । वैसे तो कला भी परिभाषा संभव नहीं है परन्तु हम फिर भी इसे परिभाषित करते हैं । इसके अलग-अलग पक्षों पर प्रकाश डाला है । कला के माध्यम से मानव अपना खोया हुआ गौरव प्रकट करने का प्रयास करता है । भरत मुनि कहते हैं:-
‘‘न तत् ज्ञान न तत् शिल्प सा विद्या न स कला ।
न तत् कर्म न तत् योगी नाट्येस्मिन यन्ने दश्यते ।।’’
21वीं शताब्दी में नृत्य का स्वरुप एकदम बदल गया है । नृत्यकला केवल कला न होकर एक विषय बन गया है । इस पर गहन अध्यन शुरु हो गया है । विद्यालय अथवा विश्व-विद्यालय मे इसका पाठ्यक्रम बन गया है । समय-समय पर इसमें अनुसंधान किये जा रहे हैं । विधार्थी को सामान्य शिक्षा के साथ नृत्य का ज्ञान करवाया जा रहा है । बहत से विधार्थियों ने इस पर गहन अध्यन हेत खेरागढ़, प्राचीन कला केन्द्र अथवा प्रयाब संगीम समिति के अलावा शांतिनिकेतन कलकत्ता से भी इस ज्ञान को बढ़ाने के लिये अनुसंधान कार्य कर रहे हैं ।
अगर प्राचीन नृत्य को देखा जाए तो उसमें शास्त्रीयता का ज्ञान सामने आता है, परन्तु लोक नृत्य भी अपनी परंपरा बनाए रखने में सक्षम है तो उसमें उस क्षेत्र का प्रभाव स्पष्ट रुप से झलकता है । उस प्रदेश, भाषा यहाँ तक कि वहाँ के व्यवसाय भी उनकी संस्कृति में छाप रखते हैं । शास्त्रीय नृत्यों के माप खण्डों का प्रयोग कर उस नृत्य को एक आकार दिया जाता है परन्तु लोक नृत्यों में बोई माप 205 न होने पर भी वह पूर्ण नृत्य का आकार पाते हैं । लोक नृत्य जनमानस से जुड़ा होता है । उसे समझना, करना और देखना उतना ही सरल होता है जितना माता द्वारा शिशु को समझना, परन्तु शास्त्रीय नृत्य हर व्यक्ति की पकड़ से बाहर है । उन्हें समझने-परखने के लिए दर्शक को भी उस स्तर का ज्ञान होना चाहिए ।
आज के युग में लोक नृत्यों और शास्त्रीयता को ध्यान में नहीं रखता अपितु अपने व्यस्त जीवन को स्कूल देने के लिए एक ऐसी परिस्थिति पाना चाहता है जो उसे वास्तविकता से अलग ले जाए तथा मनोरंजन भी हो । ऐसी अवस्था में शास्त्रीयता और लोक परंपरा की सीमा लांघ कर सामाजिक नृत्यों से परे एक अश्लीलता का वातावरण तैयार करते हैं, परन्तु मनांरेजन हेतु दर्शकों को हास्य, रति, वीरता तथा अद्भूत रसों के प्रयोग से तृप्त किया जा सकता है । शांत अवस्था भी मनुष्य को तनाव से मुक्त रख सकती है । जिस प्रकार औषधियों के सेवन मात्र से मनुष्य कई रोगों से मुक्त होता है उसी प्रकार नृत्य रस से मानव जीवन में औषधि बन सकते हैं क्योंकि नृत्य क्रियात्मक विषय है । अगर क्रिया के साथ - साथ अनुभूति के साथ नृत्य किया जाए तो वह शारीरिक अवस्था के साथ मानव मस्तिष्क को भी प्रभावित करता है । यही कार्य कोई औषधि करती है । परन्तु औषधि के रसायन कुछ समय के लिए प्रभावी होता हैं परन्तु नृत्य औषधि मानव के मस्ष्तिक और शरीर को आगे लम्बे समय के लिए स्वस्थ जीवन प्रदान करती है ।
-डा. कृष्ण कुमार शर्मा

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